देश को परमाणु शक्ति बनाने में पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी जी का था बड़ा योगदान

90 का दशक भारत के लिए कई नई तरह की चुनौतियों एवं अवसरों से भरपूर था . देश में नए-नए उद्योग लग रहें थे, शिक्षा व्यवस्था सुधर रही थी, महिला सशक्तिकरण के लिए नित नूतन तेजी से बदलाव हो रहे थे. आम आदमी के घरों में रेडियो का आगमन हो चुका था. साथ ही टेलीविज़न लोकप्रिय हो रहा था. इन सभी उपल्बधियों के बावजूद देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजेपयी जी की मुश्किलें बढ़ती जा रही थी. दरअसल वाजपेयी को देश की सुरक्षा की चिंता अंदर ही अंदर खाए जा रही थी और सच बात तो यह थी कि उनकी चिंता बेवजह नहीं थी. भारत के साथ पाकिस्तान के दो युद्ध हो चुके थे, उधर अमेरिका से भारत के संबंध कुछ खास अच्छे नहीं रहे थे. चीन बार-बार तिब्बत का राग गा रहा था. ऐसे में देश की सुरक्षा को ऐसे कवच की आवश्यकता थी, जिससे कोई भी राष्ट्र हमला करने से पहले सौ बार सोचे.

आखिरकार राष्ट्र की सुरक्षा के लिए वाजपेयी जी ने परमाणु परिक्षण करने का निर्णय लिया. यह फैसला अपने आप में जोखिम भरा काम था. भारत को पहले ही परमाणु परिक्षण की मनाही थी और पूरा विश्व विशेषकर अमेरिका भारत के ऊपर नज़र बनाए हुए था. वाजपेयी फैसले लेने के साथ-साथ उस फैसले की गंभीरता को भी समझते थे, इसलिए उन्होंने इस पूरे मिशन को गुप्त रखा. विश्व के सभी देश जब एक दूसरे को कुचलते हुए आगे बढ़ने की होड़ में लगे हुए थे, तब भारत ने अपने सबसे गोपनीय मिशन शक्ति का शुभारंभ कर दिया. इस पूरे मिशन को  गोपनीयता के साथ अंजाम भी दिया गया.11 मई 1998 को समूचे विश्व को हैरान करते हुए वाजपेयी जी ने प्रेस क्रांफ्रेंस में कहा कि हम परमाणु परिक्षण करने में सफल रहे, और हमने इस परिक्षण में वातावरण या किसी अन्य जीव जंतु को नूकसान नहीं पहुंचने दिया.

वहीं दूसरी तरफ अमेरिका ने भी यह स्वीकार किया कि अत्याधुनिक उपग्रहों से दुनियां के कोने-कोने पर नज़र रखने के बाद भी उन्हें इस परिक्षण की भनक तक नहीं लगी.

इस दिन को विशेष बनाने के मकसद से भारत सरकार ने इस दिन को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस के रूप में मनाने की घोषणा कर दी. तब से लेकर हर बार प्रौद्योग जगत में सभी को हैरान करता हुआ भारत इस दिन कुछ ना कुछ विशेष करता आया है. इसी दिन नैशनल एयरोस्पेस लैबरेटरीज द्वारा निर्मित स्वेदेशी विमान ने हंस ने भी अपनी पहली उड़ान भरी थी.