क्यों थी इन महिलाओं को वोट देने की मनाही, जानिए पहले लोकसभा चुनाव की कहानी

देश इस समय लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व यानि लोकसभा चुनाव का त्यौहार मना रहा है. लेकिन लोकतंत्र की यह यात्रा समय और राजनैतिक हालातों के साथ पहले से बहुत अधिक बदल चुकी है. आइए समझते हैं कि देश ने लोकतत्र की यह यात्रा किस तरह से शुरू की. साल 1950 में आधुनिक भारत का निर्माण हो रहा था. आने वाला समय कैसा होगा और किसका होगा ये सभी बातें उसी साल मानों तय हो रही थी. एक तरफ जहां एशियाई देशों में उथल-पुथल का दौर जारी था, तो वहीं भारत धीरे मगर प्रभावी कदमों से लोकतत्र की नींव रख रहा था. आज़ाद भारत में अब चुने हुए सरकार की मांग हो रही थी कि तभी दुनिया को चौंकाते हुए भारत ने अपने नागरिकों को सर्वभौमिक वयस्क मताधिकार सौंप दिया. सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विविधताओं एवं जातिय ऊंच-नीच के कारण सदियों की गुलामी सहने वाले देश ने अपने नागरिकों को मतदान में बराबरी का दर्जा दिया, यह जानकर पूरा विश्व अचंभित था.

भारत ने सभी नागरिकों को जब बिना किसी भेदभाव के मतदान का अधिकार दिया तो सभ्य एवं विकसित होने का दम भरने वाले देश जैसे अमेरिका और यूरोप से जवाब देते नहीं बन रहा था, क्योंकि इन राष्ट्रों में वयस्क मताधिकार होने के बाद भी सभी को वोट देने का अधिकार नहीं था और वहां अभी भी औरतें इस अधिकार से वंचित थी। वहीं दुनिया की नज़रों में अशिक्षित, गरीब और अभी-अभी आज़ाद हुआ राष्ट्र भारत दुनिया को लोकतंत्र का मतलब समझा रहा था.

हालांकि इस चुनाव को शांति एवं निष्पक्ष के साथ संपन्न करवाना पानी पर पानी से पानी लिखने जैसा ही था. लोगों में सत्ताधारियों एवं तानाशाहों का अभी भी खौफ था. सबसे बड़ी चुनौती थी कि अधिकांश लोग साक्षर नहीं थे, वह ना तो नेताओं या पार्टियों के नाम पढ़ सकते थे और ना ही चुनावी प्रक्रिया को समझ सकते थे. ऐसे में भारत के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन एवं उनके साथियों ने कलात्मक तरीकों को अपनाते हुए चुनाव को गांवों, कस्बों एवं पिछड़ें इलाकों से जोड़ दिया.

समस्याओं से निपटने के लिए कुछ बेहद अनोखे तरीको को अपनाया गया, जैसे 22400 पोलिंग बूथों का निर्माण करवाया गया, वहीं अशिक्षित लोगों को चुनाव से जोड़ने के लिए पार्टियों को विशेष चुनाव चिंह दिए गए. इस बारे में इतिहासकार रामचंद्र गुहा की माने तो भारत में रूढ़िवादी मानसिकता एक बड़ी समस्या थी। अशिक्षित होने के साथ-साथ महिलाएं यहां पुराने सोच की थी. अपनी पहचान ना बताकर वो खुद को पति या बेटे के नाम से संबोधित करती थी, जैसे ‘रामू की मां हूं ’ या ‘शंकर की पत्नी हूं’ आदि. यह समस्या कितने बड़े स्तर पर थी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस समय लगभग 28 लाख महिलाओं के नाम वोटर लिस्ट में से हटाने पड़े थे. हालांकि लोगों के लिए चुनाव कुछ नया होते हुए भी विशेष था और आम जन में ऐसा रोमांच था कि हर गली-चौराहों पर बच्चें बूढ़े प्राय चुनाव की ही बातें करते थे.

सबसे पहले मतदान यहां हुआ:

पहले वोट के साथ लोकतंत्र के बीज का अंकुर हिमाचल में फूटा और आखिरकार अपने सपनों को आकार दे रहे भारत में लोकसभा का पहला चुनाव हुआ. इस चुनाव में कांग्रेस ने सिर्फ इलेक्शन ही नहीं लोगों के दिल भी जीते और जवाहर लाल नेहरू आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. लेकिन वो वक्त था जब चुनावों में नेता अपने काम-काज का हिसाब देते थे, विपक्ष वाजिब आरोप लगाती थी और मीडिया तीखें सवालों करती थी. पर आज का चुनाव बहुत बदल गया है. सत्ताधारी पार्टी अपने काम काज का ब्यौरा देने के स्थान पर विपक्ष के कार्यकाल के दोष गिनवा रही है, विपक्ष जाति की राजनीति कर रही है, तो वहीं मीडिया टीआरपी की रोटियां सेंक रही है.ऐसा नहीं है कि जातीय समीकरणों के बदौलत पहले चुनाव लड़ने या जीतने की कोशिश नहीं होती थी और सभी नेता ईमानदार थे. लेकिन हां, अपनी बात कहने या रखने के लिए किन शब्दों का प्रयोग करना है, यह सभी भलीभांती समझते थे.

जनता को जरूर यह याद रखना चाहिए कि मत देने का अधिकार हमे अपने पूर्वजों की असंख्य कुर्बानियों की बदौलत मिला है. ऐसे में अपने मत का प्रयोग करते समय हमें जात-पात या निजी स्वार्थों से परे राष्ट्रहित को सर्वोपरि समझकर वोट करना चाहिए.