ज्ञानी ज़ैल सिंह: कैसे बना गाय चराने वाला भारत का राष्ट्रपति, क्यों चली उन पर गोली

भारत के सातवें राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह का जन्म दिवस है. आइए आज जानते हैं कि एक किसान का बेटा देखते ही देखते राजनीति की सीढियां चढ़ता हुआ भारत का महामहिम कैसे बन गया. ये कहानी किसान परिवार में जन्में एक ऐसे लड़के की है, जिसके परिवार ने कभी नहीं सोचा था कि उनका बेटा आगे चलकर देश की राजनीति का केंद्र बन जाएगा. पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह के बचपन में ही उनकी मां चल बसी, जिसके बाद ज़ैल सिंह की परवरिश उनकी मौसी ने की. एक सामान्य किसान परिवार की तरह ज्ञानी ज़ैल सिंह का बचपन भी खेतों में फसल काटतें, जानवर चरातें हुए बिता. एक समय ऐसा भी आया जब संगीत से उन्हें अपार प्रेम हो गया, वो घंटों संगीत का अभ्यास करते रहते.

 

स्वतंत्रता संग्राम का पड़ा प्रभाव:

ज़ैल सिंह का बचपन आम बच्चों की तरह कट रहा था कि अचानक देश में स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई तेज हो गई. इस आंदोलन से देखते ही देखते जेल सिंह जुड़ गए. इस आंदोलन में उनके योगदान को इसी बात से समझा जा सकता है कि इसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा. शायद यहीं से उनमें राजनैतिक चेतना का विकास हुआ.

ऐसा रहा भारत के राष्ट्रपति बनने तक का सफर:

एक बार नेहरूजी ने देखा कि कैसे पूरा फरीदकोट एक सामान्य से आदमी की बातों को ना सिर्फ सुन रहा है, बल्कि उसका अनुसरण भी कर रहा है. नेहरू जी ने उनकी योग्यता को भांपते हुए उन्हें अपनी पार्टी से जोड़ लिया और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पटियाला एवं पूर्वी राज्यों के संघ का राजस्व मंत्री बना दिया. 1951 में फिर वो कृषि मंत्री भी बने और 1956 से 1962 तक राज्यसभा के सदस्य रहे. कहा जाता है कि इंदिरा के साथ संबंध अच्छे होने के कारण उन्हें पहले पंजाब का मुख्यमंत्री एवं बाद में भारत का राष्ट्रपति बनाया गया. राष्ट्रपति बनने से पहले वो भारत के गृह मंत्री भी रहे.

इसलिए चली थी जेल सिंह पर गोली:

साल 1984 में जब पूरा पंजाब दंगों की आग में झूलस रहा था तब पंजाब को आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वर्ण मंदिर में सेना को भेज दिया. 5 जून 1984 से सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू चलाया. हैरान कर देने वाली बात यहां ये थी कि सेना के इतने बड़े ऑपरेशन का सेना के ही सुप्रीम कमांडर यानि राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह भनक तक ना थी. जिससे ज्ञानी ज़ैल सिंह इतने आहत हुए कि उन्होंने इस्तीफा देने की बात कह दी. 8 जून को जब वो भारी भरकम सुरक्षा के साथ स्वर्ण मंदिर गए तब भीड़ में से किसी ने उन पर गोली चला दी. हालांकि गोली उन्हें नहीं लगी, लेकिन भारतीय लोकतंत्र में ऐसा पहली बार हुआ जब  राष्ट्रपति को गोली का सामना करना पड़ा.